नई दिल्ली, 4 नवंबर 2026। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत ने वैश्विक स्तर पर न्यायसंगत नीतियां अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्य निर्धारित करते समय सभी देशों की आर्थिक स्थिति, विकास की जरूरतों और राष्ट्रीय परिस्थितियों का सम्मान जरूरी है।
जलवायु लक्ष्यों पर भारत का रुख स्पष्ट करता है कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सभी देशों की है। हालांकि, विकसित और विकासशील देशों की क्षमताएं अलग-अलग हैं। इसलिए सभी पर एक जैसी शर्तें लागू करना उचित नहीं होगा।
विकसित देशों की जिम्मेदारी पर जोर
भारत लंबे समय से जलवायु न्याय और समानता का समर्थन करता रहा है।
विकसित देशों ने औद्योगिक विकास के दौरान बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है।
ऐसे में भारत का मानना है कि विकसित देशों को जलवायु वित्त और स्वच्छ तकनीक उपलब्ध कराने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।
जलवायु लक्ष्यों पर भारत का रुख और स्वच्छ ऊर्जा
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
इसके अलावा, देश सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दे रहा है।
पेरिस समझौते के तहत भारत राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार जलवायु कार्रवाई और
सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखने का समर्थन करता है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. जलवायु लक्ष्यों पर भारत का मुख्य रुख क्या है?
उत्तर: भारत चाहता है कि वैश्विक जलवायु नीतियों में सभी देशों की आर्थिक स्थिति और विकास संबंधी जरूरतों का सम्मान हो।
प्रश्न 2. भारत का नेट जीरो लक्ष्य कब तक है?
उत्तर: भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
प्रश्न 3. जलवायु न्याय का क्या अर्थ है?
उत्तर: जलवायु न्याय का अर्थ है देशों की क्षमता और ऐतिहासिक जिम्मेदारी के अनुसार जलवायु कार्रवाई में निष्पक्ष भागीदारी।
NITIN KUMAR | RASHTRIYA MISSION
